Friday, 22 May 2015

Finding Me

Tied in some ropes
Without any ray of hopes
Struggling hard to survive
What do I do to revive ?
Fighting with my thoughts
What past has brought
Worrying about future
Not letting me nurture
Present is absent
In the world of nowhere
I am also lost
In convincing and recovering
Nobody cares
For everyone is luxuriating
Freedom is what I seek
From body and soul
That is the only thing
Which will make me WHOLE

RaInBoW….

From infinity to ubiquity,
Touching limitless sky & earth
Several colours spread on its band,
Indicating life’s new birth
It glows & shine,
It grows over the sky
Seeing its beautiful view,
Nature is bound to shy
Its a heavenly view
Which can be rarely seen
The bearings that devise it
Are little bit mean
It implies love of sky & earth,
Togetherness of rain & sun
We still miss the joy to cherish it
The hectic life for which we all have to run
Relish the beauty, the view of a RAINBOW


For making the sky sparklingly glow…

Thursday, 19 September 2013

शेरो शायरी

उनको कहाँ हमारी याद आती है
वो तो बस हम हैं
जो सांस भी लेते हैं तो उनकी महक से ….

कहने को तो दर्द दिल में होता है
पर आँखों से उसका रिश्ता अजीब है
जो आंसू दिल की दास्ताँ कह जाते हैं….

काश…

काश के हम कुछ ऐसा कर पाते
अपनों को खुद पर फक्र करा पाते
हार को अपनी जीत में बदलकर
नाम को अपने सार्थक कर जाते
काश के हम कुछ ऐसा कर पाते….
हर ज़ख्म ने कुरेदा हमें बार बार
किस्मत ने धकेला हमें और दिए अनगिनत वार
फिर भी अपनी जीत का डंका
काश हम भी बजाकर जाते
काश के हम कुछ ऐसा कर पाते…
रिश्तों में धोखा खाया हमने
समय की चुनोतियों को झेला हमने
तूफानों को पार कर
काश हम अपना आशियाँ बचा पाते
काश के हम कुछ ऐसा कर पाते…
निराशा ना थी जीवन का आधार
हंस कर झेले थे हमने सबके वार
पर आखिर में दम तोड़ चले हम
काश आखरी सांस तक हम भी लड़ पाते
काश के हम कुछ ऐसा कर पाते….

कही – अनकही

मन में है हलचल
जो शब्दों में ना पिरो पा रही
बेचैनी है ऐसी
जिससे खुद को ना रोक पा रही
अनजाने एहसास हैं ये
जिनसे नदारद हूँ मैं
ख़ुशी या गम का
ना नामोनिशान हैं ये
खोज रही हूँ
अपनी ही पहेली का जवाब मैं
क्यूँ खो रही हूँ
अनचाहे एहसास के साथ मैं
ना कह पाने की
ये उलझन भी कितनी अजीब है
सोचा तो जाना
मन का तो कोई भी ना मीत है
रूह भी कुछ
बदलना है चाह रही
मेरी राहों की दिशा का मुख
मोड़ना है चाह रही
फिर क्यूँ नहीं
मैं उनके साथ चल पा रही ?
ये कैसी है दुविधा
जो मेरे दिल को है तोड़े जा रही
व्यथा से अपनी
अनजान ना हूँ
कहने को है इतना
पर फिर यूँ बेजुबान क्यूँ हूँ ?

यादें..

यादों का पिटारा
है अश्रुओं का भंडारा
ख़ुशी और गम
दोनों का इसमें अनमोल संगम
कुछ सहेजे हुए पल
कुछ अनचाही हलचल
है कैसा अजब
ये यादों का समंदर
डूब जाए जो कोई अगर
तो पार लगना है मुश्किल
मझदार फंस जाए जो कोई
तो हिम्मत ना इनसे बड़ी कोई
वो याद ही है
जो जोड़े अतीत के सुनहरे पल
वो याद ही है
जो रुला दे और कर दे हृदय कोमल
ना जाने खुदा को कैसे ये सुझाया
जो यादों का पिटारा हर एक के झोली में है  भिजवाया…

Saturday, 31 August 2013

खो रही हूँ....

ये कैसी बेरुखी है उनकी
जो दिल ज़ार ज़ार कर देती है

ये कैसी डोर है बांधी उसने
जो हर बार उसकी ओर खींच लेती है

चाहे न चाहे ये मन
दौड़ पड़ता है उसके संग

कहने को है दूरी लेकिन
क्यूँ सांसें भी उसकी महसूस होती हैं

हर बार न लौटने का वादा करती हूँ खुद से
पर खुद ही उससे दूर नहीं रेह पाती हूँ ...

कहाँ जाऊन ऐ खुदा, दिशा दे
खो रही हूँ अपनी ही गलियों में, मदद दे ...