Thursday, 19 September 2013

कही – अनकही

मन में है हलचल
जो शब्दों में ना पिरो पा रही
बेचैनी है ऐसी
जिससे खुद को ना रोक पा रही
अनजाने एहसास हैं ये
जिनसे नदारद हूँ मैं
ख़ुशी या गम का
ना नामोनिशान हैं ये
खोज रही हूँ
अपनी ही पहेली का जवाब मैं
क्यूँ खो रही हूँ
अनचाहे एहसास के साथ मैं
ना कह पाने की
ये उलझन भी कितनी अजीब है
सोचा तो जाना
मन का तो कोई भी ना मीत है
रूह भी कुछ
बदलना है चाह रही
मेरी राहों की दिशा का मुख
मोड़ना है चाह रही
फिर क्यूँ नहीं
मैं उनके साथ चल पा रही ?
ये कैसी है दुविधा
जो मेरे दिल को है तोड़े जा रही
व्यथा से अपनी
अनजान ना हूँ
कहने को है इतना
पर फिर यूँ बेजुबान क्यूँ हूँ ?

यादें..

यादों का पिटारा
है अश्रुओं का भंडारा
ख़ुशी और गम
दोनों का इसमें अनमोल संगम
कुछ सहेजे हुए पल
कुछ अनचाही हलचल
है कैसा अजब
ये यादों का समंदर
डूब जाए जो कोई अगर
तो पार लगना है मुश्किल
मझदार फंस जाए जो कोई
तो हिम्मत ना इनसे बड़ी कोई
वो याद ही है
जो जोड़े अतीत के सुनहरे पल
वो याद ही है
जो रुला दे और कर दे हृदय कोमल
ना जाने खुदा को कैसे ये सुझाया
जो यादों का पिटारा हर एक के झोली में है  भिजवाया…

Saturday, 31 August 2013

खो रही हूँ....

ये कैसी बेरुखी है उनकी
जो दिल ज़ार ज़ार कर देती है

ये कैसी डोर है बांधी उसने
जो हर बार उसकी ओर खींच लेती है

चाहे न चाहे ये मन
दौड़ पड़ता है उसके संग

कहने को है दूरी लेकिन
क्यूँ सांसें भी उसकी महसूस होती हैं

हर बार न लौटने का वादा करती हूँ खुद से
पर खुद ही उससे दूर नहीं रेह पाती हूँ ...

कहाँ जाऊन ऐ खुदा, दिशा दे
खो रही हूँ अपनी ही गलियों में, मदद दे ...

Tuesday, 7 May 2013

एहसास


किसी की क़द्र उसके जाने पर होती है
रोता है इंसान पर रूह छूट चुकी होती है
जीते जी कोई मांगता है समय
पर हमारी घड़ी कभी कहाँ रूकती है
साँसे थम जाने पर गलती महसूस होती है
जी लो इस पल में, हर पल में यहाँ
क्यूंकि कोई नहीं जानता किसकी साँसे कब रूकती हैं....

व्यथित मन


बैठकर अब सबके बीच,
मेरी आंखें वो देखती हैं
जो दौर है आज
वो बीते कल में मेरा था
यूँही दौड़ दौड़ जीवन
मैंने भी गुज़ारा है
जिम्मेदारियों को कंधे पर
हँस हँस ढो कर निभाया है
मन हो रहा कुछ व्यथित है
अकेलेपन से ये ग्रसित है
मैं हँस क मन को समझा रहा
तू क्यूँ पगला रो रहा
तूने भी मेरे संग
वो दौर जीया है
जिसमें सबके संग
ज़िन्दगी का लुत्फ़ लिया है
आज ये दौर इनका है
जीने दे इन्हें
खुश रहने दे इन्हें
जो मेरा आज है
वो भी कल इनका होगा
हर इंसान इस दौर से गुजरेगा
मैं भी यूँही बैठा
सोच रहा अपने मन की व्यथा...

Monday, 6 May 2013

अनजान रिश्ता



एक नाम से यूँ पहचान हो गयी
क बाकि सारी दुनिया अनजान हो गयी
उसकी कशिश की कोई सीमा न थी
के सारी काएनात की सरहदें पार हो गयी
हर लम्हा सा जी लिया उसके संग
के फिर ज़िन्दगी में खुशियाँ बेशुमार हो गयी
कुछ भी न बाकी था मिलने के सिवा
पर इंतज़ार की घड़ियों की कतार हो गयी....

जीने का गुर


खामोश सी ये रातें कुछ कह रही हैं
आंचल में अपने सपने पीरो रही हैं
दूर कहीं किसी तारे ने ख्वाहिश हैं जताई
चन्द्रमा के पास होकर भी है किसी से उसकी जुदाई
आस्मां की चमक बनाते बनाते
अपने ख्वाबों की चमक वो भूल गया
ना जाने कब होगा अधूरापन पूरा
येही सवाल है रात से कर रहा
रात मुस्कुरायी, बोली, ना उदास हो ऐ तारे
अपने ख्वाब को पूरा करना ही मकसद नहीं इस जग का, मेरे प्यारे
दूसरों को मुस्कराहट देना, जगमगाहट देना
जो तू बखूबी है कर रहा
वही तेरा ख्वाब और तेरा मकसद है बदल रहा...